Guide To Buying Your First Rolex uk replica watches Part 2: What To Buy Rolex Submariner Replica Watches Steel-41 Recently, we spoke with the Rolex Replica boutique in Beverly Hills, and they confirmed that Rolex has about 2,000 SKUs even though there are only a few product families to choose from. That effectively means that there are tons of available replica Rolex watches to choose from. And that doesn't even include Rolex's rather intense catalog of vintage and no-longer-Replica Handbags produced models.

कलयुग में चन्द्रवंश में महान संगठन की स्थापना :

प्राचीनकाल में भारत विश्व का सबसे श्रेष्ठ देश था, इसेे विश्व के गुरु होने का गौरव भी प्राप्त है।  विश्व के इतिहास में भारत का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकत है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, धार्मिक, औद्योगिक वैज्ञानिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में भारत अपनी सफलता के लिये प्रसिद्ध था। विश्व के समस्त राष्ट्र भारत के सामने नतमस्तक रहते थे। भारत की गरिमा से प्रभावित होकर मानव को क्या कहा जाए भगवान भी भारत की पावन धरती पर आने के लिये ललायित रहत्ते थे। वेद, पुराणों, ग्रथों, के अध्ययन से यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि समय पाकर भगवान भी भारत के पावन धरती पर अवतरित हो नरलीला' करने का काम किया है तथा कालान्तर में चलकर प्रसिद्धि को प्राप्त किया है।

भारत के निर्माण में, इसमें वास करने वाले समस्त प्राणियों का हाथ रहा है । लेकिन सृष्टि के निर्माण एवं कर्म क्षेत्र के आधार पर की गयी वर्ण व्यवस्था के बाद भारत के गौरव को बढाने में क्षत्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहीं है । क्षत्रिय परिवार में दो वंशो के क्षत्रियों ने अपने त्याग, बलिदान, एवं कूर्बानी से देश श्रेष्ठ बनाने का काम किया है जो किसी से छिपा नहीं है। भारत का नामकरण भी चन्द्रवंशी क्षत्रिय राजा भरत के नाम पर ही हुआ है। इस वंश में ऐसी विभूतियों का जन्म हुआ जिन्होंने अपने पराक्रम से इतिहास की दिशा ही बदल दी। ग्रथों में अपना इतिहास अपने हाथों से लिखने एवं पाने का काम किया है । चन्द्रवंश के ही पराक्रमी, न्याय, दानी एवं त्यागी राजा नहुष ने भगवान 'इन्द्र' की भी गद्दी को भी सम्भालने का काम किया है। राजा नहुष के विवाह माता पार्वती एवम् महादेव शंकर के पुत्री अशोक सुंदरी से हुआ था।

 द्वापर युग में अहंकार, अन्याय, शोषण, दोहन से आमलोगों को मुक्ति दिंलाने के लिये अपने ही परिवार के महान् एवं पराक्रमी योद्धाओं से ”कुरूक्षेत्र” के मैंदान में एक 'महान धर्मयुद्ध' लड़ने का काम किया जो "महाभारत" के नाम से देश-विदेश में जाना जाता हैं। इस महान युद्ध में भगवान विष्णु को 'कृष्ण' के रूप में चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश में ही अवतार लेकर अपनी भूमिका का निर्वाह करना पड़ा था।

आज हम जिस किसी भी महान ग्रंथो, वेदों एवं पुराणों का अध्ययन करें "चंद्रवंशी क्षत्रिय" वंश की महत्ता आसानी से समझी जा सकती हैं। लेकिन संसार में परिवर्तन हमेशा चलता रहता है। उसी क्रम में चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश के उत्थान की गति रुकी और पतन की गति प्रारम्भ हो गई। महाराजा जरासंध जो एक विशाल मगध साम्राज्य के राजा थे, चन्द्रवंश क्षत्रिय वंश के अंतिम चक्रवर्ती सम्राट हुये। इनके बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और बाद में 'महानंद' ने 'मगध साम्राज्य' पर अपना अधिपत्य जमाकर ऐसा शोषण, दोहन एवं आतंक का वातावरण बनाया कि चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार को अपना घर द्वार छोड़कर अन्य जगहों पर भागना पड़ा। उसी समय से इस वंश का सिलसिला शुरू हुआ, जो काल परिवर्तन होने पर भी रुकने का नाम नहीं लिया। लेकिन समय ने पलट खाया और इस वंश में ऐसी विभूतियों का जन्म हुआ जिन्होंने भारत की गुलामी के समय में सन् 1868 में एक जगह बैठकर देश की गुलामी से मुक्ति दिलाने सहित चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार के तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक आदि पहलुओं पर गहरा चिंतन किया।

एक तरफ देश की आजादी की लड़ाई में भागीदारी लेना एवं दूसरी तरफ सामाजिक क्षेत्रों में एकता बनाकर चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार को पूर्व के गौरव सम्मान एवं प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में क्रांतिकारी कदम उठाना। इन दोनों कार्यों को एक साथ करना, उस अंग्रेजी हुकूमत के समय आसान काम नहीं था। फिर भी हमारे मनीषियों ने दोनों क्षेत्र में चिंतन एवं कार्रवाई जारी रखा।

इसी क्रम में स्व० नथुनी प्रसाद सिंह जी का प्रादुर्भाव हुआ। सितम्बर 1856 ई० में पटना सिटी के मारुफगंज में जन्में बाबू नथुनी जी का लालन पालन बहुत ही सुखी माहौल में हुआ। इनके पिता बाबू श्यामलाल सिंह जी उस ज़माने के जाने माने एजेंट एवं आर्डर सप्लायर थे। बालक नथुनी जी ज्यों ज्यों बड़े हुए सादगी और व्यव्हार से ओत प्रोत होते गए और आगे चलकर उन्होंने चन्द्रवंशी समाज के अलावे शोषितों, दलितों के उत्थान के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये।

समाज सेवा के इसी दौर में अपने छिपे लोगों की खोज की प्रक्रिया में सन् 1906 में एक राष्ट्रिय मंच की स्थापना की, जिसका नाम "ऑल इण्डिया चंद्रवंशी क्षत्रिय महासभा" रखा। इसके कार्यकारिणी में बंगाल से लेकर लाहौर तक लोगों का प्रतिनिधित्व किया गया।

सन् 1912 ई० में भारत के जनगणना विभाग के प्रधान से मिलकर उन्होंने चंद्रवंशियों के इतिहास की जानकारी दी और भारत कंपनी एक्ट 1882 के तहत महासभा का रजिस्ट्रेशन "अखिल भारतवर्षीय चन्द्रवंशी क्षत्रिय महासभा" नाम से करवाया।

महासभा के स्थापना के बाद चन्द्रवंशी क्षत्रिय परिवार के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि पहलुओं के क्षेत्र में विकासमूलक कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया, जिसके क्रांतिकारी कदम का विरोध उस समय के सामंती वर्ग एवं अंग्रेजी हुकूमत के हुक्मरानों ने किया। क्योंकि जहाँ महासभा सामाजिक लड़ाई उस समय की व्यवस्था से लड़ रही थी, जो अंग्रेजी हुकूमत के हिमायती थे, वहीं देश के आजादी की लड़ाई के लिये कार्यकर्ताओं को भी प्रशिक्षित कर रही थी। परिणाम यह निकला कि महासभा के पदाधिकारियों को खुनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी। जेल के शिकंजो में बंद होना पड़ा। जाने गंवाने पड़ी एवम् घर द्वार छोड़कर अपने देश में ही शरणार्थी होना पड़ा। लेकिन महासभा के पदाधिकारियों, समर्थकों एवं सदस्यों ने अपने अभियान को जारी रखा।

महासभा ने सन् 1918 ई० तक स्व० नथुनी प्रसाद सिंह के नेतृत्व में उस समय के राजे, राजवाड़े, नवाबों एवं अंग्रेजी हुकूमत के हुकामरानों से संघर्ष किया तथा उत्तरोत्तर गति से अपने लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर बढ़ती रही। बाद में डॉ० मुरलीधर सिंह, अमरनाथ सिंह, गोपीनाथ सिंह, महादेव सिंह, शिवनारायण सिंह, राय साहब सनातन सिंह, अमीरचंद सिंह, शालिग्राम सिंह, गंगा प्रसाद सिंह, शिव गुलाम सिंह, मंगल प्रसाद, प्राणनाथ सिंह, नन्द लाल सिंह, दमड़ी सिंह, त्रिवेणी नाथ दास, डॉ० रामरतन सिंह के नेतृत्व में महासभा के कार्यक्रम लाहौर से लेकर बंगाल तक सफलता पूर्वक चलता रहा।

 सामजिक सम्मान के साथ लोग देश की गुलामी की जंजीर तोड़ने के लिये अपने जीवन की बिना कीमत मांगे देश की आजादी की बलिबेदी पर अपनी कुर्बानियां देना प्रारंभ कर दिया। उसमें स्व० पलटू चन्द्रवंशी भोजपुर, भगवानलाल मुजफ्फरपुर, स्व० छेदीदास, बालकेश्वर चन्द्रवंशी (चंद्रगढ़, नवीनगर) जी का नाम देश की आजादी के लिये शहीद होनेवाले योद्धाओं के सूची में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हैं। अन्य हजारों की संख्या में शहीद हुए क्षत्रिय चंद्रवंशियों का नाम उसी तरह गायब हैं, जैसे बने भवन के नींव में पड़ी ईंट का होता हैं।

लेकिन अफ़सोस की बात यह रही कि महासभा द्वारा संचालित सारे क्रन्तिकारी कदमों पर उस समय विराम लग गया जब हमारा मुल्क 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ।

उस समय हमारे मनीषि आजादी का जश्न मनाने में लग गए जो करीब 26 जनवरी 1950 तक जारी रहा।इस अवधि की निष्क्रियता ने ना आजाद मुल्क में चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार की भागीदारी ही सुनिश्चित करा पाई और ना महासभा के बढ़ते कदम को ही कायम रख सकी। फलतः आपसी विवाद गहराया, एकता टूटी और चंद्र लोगों ने अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु महासभा के अंदर जंग छेड़ दिया और 1968 के दशक में महासभा को कमजोर करने का काम किया। जहां हमारा संगठन लाहौर, दिल्ली, शिमला, गोरखपुर, बनारस, गाजीपुर, इलाहाबाद, मिर्जापुर, मुगलसराय, बंगाल, उड़ीसा, दानापुर, पटना, गया, छपरा, धनबाद आदि जगहों में सन 1918 में ही बन गया था।

सभी शाखाओं का विस्तार ग्राम सभा, पंचायत सभा, थाना सभा, जिला सभा, प्रदेश सभा स्तर पर करने का काम जिस गति से 1947 के पूर्व तिथि 1950 से 1964 के दशक तक विराम लग गया। हम तमाम चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार के लिए यह अवधि भारी नुकसानदेह रही। 1964 से 1970 के दशक तक स्व० टी० एन० दास, कोकिल प्रसाद सिंह एवं स्व० शिवदास सिंह के नेतृत्व में समस्त विचारधाराओं को एक साथ जोड़कर महासभा का कार्य तूफानी गति से चलाया गया और गांव में निवास करने वाले समस्त चंद्रवंशी भाइयों एवं बहनों को महासम्मेलन, सम्मेलन, प्रचार सभा, रैली एवं प्रशिक्षण शिविर का आयोजन कर महासभा के साथ जोड़ा गया जो 1970 से 1980 के दशक तक कायम रहा और बड़े पैमाने पर ग्राम, पंचायत, थाना, प्रखंड, जिला एवं प्रदेश स्तर तक शाखा सभाओं का गठन हुआ। नव जवानों एवं नव युक्तियों में जागरूकता आयी। लोगों को संगठन के प्रति प्रेम जगा। संगठन में राजनीतिक प्रस्ताव युवाशक्तियों द्वारा उठाया गया। राजनीतिक प्रस्ताव के माध्यम से भारतीय राजनीति में चंद्रवंशी परिवार की भागीदारी सुनिश्चित करने की लड़ाई सड़कों पर आना प्रारंभ हो गई।

1980-1990 के दशक में प्रतिस्पर्धा बढ़ी। अशिक्षा, अंधविश्वास एवं सामाजिक कुरीतियों से जमकर लड़ने की योजना बनी। 8 मार्च 1994 को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में चंद्रवंशियों की विराट रैली का आयोजन किया गया जिस से पटना की सड़के भर गई। गाँव-गाँव में शिक्षा के प्रति सम्मान पैदा हुआ। आपसी एकता का प्रदर्शन करने के लिए आम लोगों को प्रशिक्षित किया गया। राजनीतिक दलों से जुड़ने के लिए नौजवानों एवं नियुक्तियों को प्रेरित किया गया। अपनी मांगों को महारैली रैली प्रदर्शन आदि तरीकों से सरकार के सामने रखने के लिए मसौदा बनाया गया तथा कार्यान्यवन के लिए दिशा तय किया गया। सन् 1990 से 2000 के दशक तक आम चंद्रवंशी परिवार के चौमुखी विकास हेतु एक योजना बनाई गयी।

सर्वप्रथम तिलक दहेज जैसी दानवी शक्ति से निपटने के लिए वर्ष 1998 में "चंद्रवंशी सामूहिक विवाह" का आयोजन बोधगया की पावन धरती के कालचक्र मैदान में प्रारंभ किया जिसमें आशातीत सफलता मिली और समाज के हर वर्ग द्वारा सराहा भी गया। महारैली, रैली, महासम्मेलन, सम्मेलन आदि के माध्यम से तत्कालीन सरकार को चंद्रवंशी एकता का एहसास भी कराया गया। परिणामस्वरूप हमारे बीच विधानसभा, विधान परिषद के टिकट राजनीतिक दलों से दिए गए। जिसका लाभ चंद्रवंशी परिवार को मिला। सन 2001 से 2006 तक महासभा ने प्रारंभ में अपनी एकता से झारखंड प्रदेश के सरकार को अपनी ताकत दिखाने का काम किया। साथ ही देवघर के महासम्मेलन की सफलता ने पूरे भारतवर्ष के जगह मसीह परिवार के सामाजिक राजनीतिक शैक्षणिक आर्थिक सांस्कृतिक दिवाली वो में विकास के सारे मार्ग खोल दिए थे। हमारी युवा शक्ति में एक नया जोश आया था। उनका मनोबल बढ़ा था। महासभा के प्रति उनमें सम्मान पैदा हुआ था।
भारत के केंद्रीय एवं प्रांतीय सरकारों एवं राजनीतिक दलों में हलचल पैदा हो गई थी कि चंद्रवंशी परिवार में एकता बनी है। यह अपने अधिकारों के लिए मरने-मारने को तैयार है। यदि इसका अधिकार इन्हें नहीं दिया गया तो छीनने में सक्षम है। इनके उत्थान का सारा वातावरण इनका केंद्रीय मंच अ०भा०च०अ० महासभा ने बनाया है, उसे नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन अफसोस की बात रही है "देवघर" महासम्मेलन के प्रदर्शन के बाद हमारे बढ़ते कदम पर पुनः विराम लग गया। फलतः उसके बाद के बिहार एवं झारखंड प्रदेश में होने वाले चुनावों में हमें तरजीह नहीं दिया गया और समझा गया कि हमारी वो ताकत आज नहीं है। हम बिखरे हैं खंडो में विभाजित हैं। लेकिन ऐसी बात नहीं है। आज हमारी महासभा अपनी स्थापना के 100 वर्ष पार कर गई है। इस अवधि में महासभा के सामने अनेक बाधाएँ आयी, जिसे महासभा ने सफलतापूर्वक निपटाने से लेकर आज तक आने वाली बाधाएँं एवं संकटों में महासभा जूझते हुए निपटने का काम किया और विजयी होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति की ओर बढ़ती रही।

महासभा देश के तमाम चंद्रवंशी परिवारों को यह विश्वास दिलाती है कि बुजुर्गों का आशीर्वाद, वयस्कों का कंधा से कंधा मिलाकर साथ एवं नौजवानों की कुर्बानी मिले तो दुनिया की कोई भी ताकत आगे बढ़ने से रोक नहीं सकता है। आज महासभा के संगठन को पारदर्शी बनाना होगा। आर्थिक दृष्टिकोण से शक्तिशाली बनाना होगा। पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों को व्यक्तिगत स्वार्थ त्यागना होगा। सामूहिक नेतृत्व में काम करने की आदत बनानी होगी। दलगत भावना को त्यागना होगा। युवाशक्तियों में सम्मान पैदा करके आगे लाना होगा। हर स्तर पर प्रशिक्षण शिविर लगाकर कार्यकर्ताओं एवं पदाधिकारियों को प्रशिक्षित करना होगा। वर्तमान के बुजुर्गों को आने वाली पीढ़ी के मार्ग प्रशस्त करने हेतु कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना होगा।

आशा हैं कि शताब्दी समारोह चंद्रवंशी परिवार में एकता सद्भाव एवं प्रेम बढ़ाने का संदेश दिया हैं एवं चट्टानी एकता कायम रखने में सहायक सिद्ध होगा और विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न उपनाम के साथ जीने वाले चंद्रवंसियों को एक राष्ट्रीय मंच प्रदान करेगा ताकि हम अपने अधिकारों से वंचित ना कर दिए जाए।
हमसभी जानते हैं कि चन्द्रवंशी समाज धरती के आदि निवासी हैं और आज भी इस कलयुग में धर्म एवं विज्ञान तथा तकनिकी और सामाजिक क्षेत्र में अपना योगदान देने में अग्रणी हैं और आशा करते हैं हमलोग भविष्य में भी मानव हित में एवं जीवन के लिये कल्याणकारी कार्य करते रहेंगे।